भोपाल। केन-बेतवा लिंक परियोजना अब सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि आदिवासी अस्तित्व पर सीधा हमला बनती नजर आ रही है। 8 गांवों को डुबाने की तैयारी के बीच, जिन लोगों की पीढ़ियों की जमीन छिन रही है, उन्हें न न्याय मिला, न सम्मान—सिर्फ आश्वासन और अनदेखी।
हालात इतने विस्फोटक हो चुके हैं कि आदिवासी परिवारों ने विरोध का सबसे भयावह रूप अपनाया—अपनी ही चिता सजाकर उस पर लेट गए। यह सिर्फ प्रदर्शन नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ अंतिम चेतावनी है।
🔥 “या तो नया गांव दो, या हमें जला दो” — ये सिर्फ नारा नहीं, हकीकत है
- 8 गांव पूरी तरह डूब क्षेत्र में
- सैकड़ों परिवार विस्थापन की कगार पर
- मुआवजा—ना के बराबर या बेहद कम
- पुनर्वास—कागजों में, जमीन पर शून्य
🚨 सरकार पर सीधे सवाल
- क्या आदिवासियों की जमीन विकास के नाम पर जबरन छीनी जा रही है?
- क्यों नहीं लिया गया ग्रामसभा की सहमति का सम्मान?
- क्यों आज भी लोग अपने हक के लिए “चिता” तक पहुंच गए?
- क्या प्रशासन जानबूझकर हालात को विस्फोटक बना रहा है?
⚠️ प्रशासन की “खामोशी” या मिलीभगत?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारी केवल दबाव बनाने और विरोध दबाने में लगे हैं।
संवाद की जगह नोटिस, समाधान की जगह टालमटोल—क्या यही शासन है?
💣 जमीन नहीं, पहचान दांव पर
यह सिर्फ घर-खेत का मुद्दा नहीं—
यह संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व का सवाल है।
आदिवासी समाज के लिए जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, जीवन का आधार है।
🔴 अगर अब भी नहीं जागी सरकार…
तो यह आंदोलन सिर्फ 8 गांवों तक सीमित नहीं रहेगा।
यह बन सकता है एक बड़ा जनआंदोलन, जो सत्ता की नींव तक हिला देगा।
📢 अंतिम सवाल
क्या विकास की कीमत आदिवासियों की चिता होगी?
या सरकार समय रहते न्याय देकर इस आग को शांत करेगी?
👉 अब फैसला सत्ता के हाथ में है—
संवाद या संघर्ष?