डिंडौरी। जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक में एक ओर जहां सिकल सेल एनीमिया जांच अभियान को तेज करने के निर्देश दिए गए, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर प्रशासन और सरकार दोनों पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। बैठक की अध्यक्षता कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने की, जिसमें स्वास्थ्य योजनाओं की समीक्षा के साथ सख्त निर्देश भी दिए गए।
⚡ निर्देश बहुत, लेकिन जमीनी हकीकत क्या?
बैठक में सिकल सेल जांच, टीबी स्क्रीनिंग, मातृ-शिशु स्वास्थ्य, एनीमिया नियंत्रण और आयुष्मान कार्ड निर्माण जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया।
साथ ही डॉ. भीमराव अंबेडकर स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से जांच अभियान को गति देने की बात कही गई।
👉 लेकिन सवाल यह है कि:
- क्या ये अभियान सिर्फ शिविरों तक सीमित रह जाएगा?
- क्या पहले चल रही योजनाओं के परिणाम जनता तक पहुंचे भी हैं या नहीं?
🏛️ प्रशासन पर सवालों की बौछार
- बार-बार बैठकों और निर्देशों के बावजूद मातृ मृत्यु और एनीमिया की स्थिति क्यों गंभीर बनी हुई है?
- क्या स्वास्थ्य अधिकारी सिर्फ रिपोर्ट बनाकर जिम्मेदारी से बच रहे हैं?
- दवा दुकानों की जांच के आदेश हर बार दिए जाते हैं, लेकिन कितनों पर वास्तव में कार्रवाई हुई?
🗳️ सरकार भी घेरे में
आदिवासी बहुल जिले डिंडौरी में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत को लेकर अब सियासत तेज होती दिख रही है।
- क्या स्वास्थ्य योजनाएं सिर्फ आंकड़ों का खेल बनकर रह गई हैं?
- आयुष्मान कार्ड और टीकाकरण के 100% लक्ष्य की बात—क्या यह जमीनी सच्चाई से मेल खाती है?
- सिकल सेल जैसी गंभीर बीमारी पर स्थायी नीति क्यों नहीं दिख रही?
💊 दवा गुणवत्ता पर सख्ती—या सिर्फ चेतावनी?
कलेक्टर ने दवा दुकानों की जांच और एक्सपायरी दवाओं पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
👉 लेकिन बड़ा सवाल यही है कि:
क्या इस बार वास्तव में कार्रवाई होगी या फिर यह भी कागजों तक सीमित रह जाएगी?
🎯 जनता के बीच उठता बड़ा सवाल
👉 क्या यह पूरी कवायद जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं दे पाएगी, या फिर एक बार फिर योजनाएं फाइलों में ही दब जाएंगी?
बैठक और निर्देशों के बीच असली परीक्षा अब जमीनी अमल की है। अगर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह पूरा अभियान भी सिर्फ दावे और हकीकत के बीच का अंतर बनकर रह जाएगा।