
टपकती छतें… दरकती दीवारें… जंग खा चुकी सरिया… फिर भी फाइलों में कैद है नए आवासों का सपना
अमरपुर (डिंडौरी)। यह सिर्फ जर्जर भवनों की कहानी नहीं, बल्कि उन कर्मचारियों की मजबूरी है जो हर दिन सरकारी जिम्मेदारियां निभाते हैं और हर रात इस डर के साथ सोते हैं कि अगली बारिश कहीं उनकी छत ही न गिरा दे। जनपद पंचायत अमरपुर के लगभग 45 वर्ष पुराने शासकीय आवास अब खंडहर का रूप ले चुके हैं। दीवारें जवाब दे रही हैं, छतें पानी उगल रही हैं और सरिया जंग खाकर अपनी मजबूती खो चुकी है।
विडंबना यह है कि जिन कर्मचारियों के भरोसे गांवों की योजनाएं और प्रशासनिक व्यवस्था चलती है, वही कर्मचारी आज सुरक्षित छत के लिए तरस रहे हैं। कई कर्मचारी मजबूरी में निजी खर्च पर रोजाना लंबी दूरी तय करते हैं, तो कुछ इन जर्जर आवासों में रहने को विवश हैं।
स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि मुख्यालय में रहने योग्य आवास नहीं हैं और अधिकारी जिला मुख्यालय से नियमित आवागमन कर रहे हैं, तो वर्षों से नए आवासों के निर्माण का स्थायी समाधान आखिर क्यों नहीं निकल पाया?
हर बारिश के साथ डर बढ़ता है। कर्मचारी तिरपाल डालकर पानी रोकते हैं, बाल्टियों में रिसता पानी भरते हैं और अगली सुबह फिर ड्यूटी पर निकल जाते हैं। यह तस्वीर केवल भवनों की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की भी है जो समय पर समाधान का इंतजार करती दिख रही है।
सबसे बड़ा सवाल
क्या इन जर्जर सरकारी आवासों की कहानी किसी बड़े हादसे के बाद ही सुर्खियां बनेगी, या उससे पहले सुरक्षित आवास का इंतजाम होगा?
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