
गोटेगांव अस्पताल में इलाज के साथ शवों का पोस्टमार्टम, आखिर किसकी फाइलों में दफन है जनता का हक?
विशेष संवाददाता | राजकुमार दुबे | भोपाल/गोटेगांव
नरसिंहपुर जिले के गोटेगांव से स्वास्थ्य व्यवस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जिस अस्पताल में लोग जिंदगी बचाने की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, उसी परिसर में अब शवों का पोस्टमार्टम किया जा रहा है। कारण—1970 में बना पोस्टमार्टम भवन जर्जर होकर ध्वस्त हो गया, लेकिन 10 लाख रुपये की स्वीकृति मिलने के बाद भी नया भवन सिर्फ सरकारी फाइलों में जिंदा है।
यह सिर्फ एक भवन की कहानी नहीं, बल्कि सुस्त प्रशासन, लटकती टेंडर प्रक्रिया और जवाबदेही के अभाव का जीवंत उदाहरण है।
🏥 अस्पताल या पोस्टमार्टम सेंटर?
इलाज कराने आए मरीज, उनके परिजन, महिलाएं और बच्चे एक ऐसे माहौल से गुजर रहे हैं, जहां कुछ ही दूरी पर शवों का पोस्टमार्टम किया जा रहा है। यह स्थिति न केवल मानसिक रूप से विचलित करती है, बल्कि अस्पताल की गरिमा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी सवाल खड़े करती है।
💰 10 लाख की मंजूरी… लेकिन काम शून्य
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि नए पोस्टमार्टम भवन के लिए शासन पहले ही 10 लाख रुपये स्वीकृत कर चुका है। इसके बावजूद निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ।
सवाल यह है कि—
आखिर फाइल किस टेबल पर अटकी है?
टेंडर प्रक्रिया में इतनी देरी क्यों?
मंजूर बजट का लाभ जनता तक कब पहुंचेगा?
देरी की जिम्मेदारी कौन लेगा?
⚠️ कर्मचारियों की मजबूरी, मरीजों की परेशानी
पोस्टमार्टम करने वाले कर्मचारियों को भी सीमित संसाधनों में काम करना पड़ रहा है। आधुनिक सुविधाओं के अभाव में संवेदनशील कार्य करना उनके लिए भी चुनौती बना हुआ है।
🗣️ जिम्मेदारों का पक्ष
ब्लॉक मेडिकल अधिकारी डॉ. एस.एस. धुर्वे का कहना है कि पुराना पोस्टमार्टम भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका था। सड़क से नीचे होने के कारण उसमें पानी भर जाता था। करीब एक वर्ष से अस्पताल में ही पोस्टमार्टम किए जा रहे हैं। इस संबंध में सीएमएचओ और नगर पालिका को पत्र भेजा जा चुका है।
विधायक महेंद्र नागेश ने बताया कि 10 लाख रुपये की राशि स्वीकृत हो चुकी है। टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद नया भवन बनाया जाएगा।
🔥 सिस्टम से बड़े सवाल
✅ जब राशि स्वीकृत हो चुकी थी तो निर्माण अब तक क्यों शुरू नहीं हुआ?
✅ क्या मरीजों की भावनाओं और अस्पताल के वातावरण की कोई कीमत नहीं?
✅ क्या सरकारी मशीनरी सिर्फ स्वीकृति देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती है?
✅ आखिर जनता कब तक कागजों में विकास और जमीन पर बदहाली देखती रहेगी?
गोटेगांव का पोस्टमार्टम भवन केवल एक जर्जर इमारत नहीं, बल्कि सरकारी कार्यप्रणाली की धीमी रफ्तार का प्रतीक बन चुका है। जब स्वीकृत बजट होने के बावजूद वर्षों तक निर्माण शुरू न हो, तो सवाल सिर्फ भवन का नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी बनता है।
अब निगाहें प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर हैं—क्या नया पोस्टमार्टम भवन जल्द बनेगा, या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में दफन रह जाएगा?
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