
रस्सी पर झूलता बचपन, फाइलों में दम तोड़ती योजनाएं — सिस्टम का सच बेनकाब
अमरपुर/डिंडौरी। एक तरफ सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” और बाल कल्याण जैसी योजनाओं के बड़े-बड़े दावे करती है, दूसरी ओर अमरपुर बस स्टैंड पर एक मासूम बच्ची अपनी जान हथेली पर रखकर रस्सी पर करतब दिखाने को मजबूर है। यह दृश्य केवल एक परिवार की गरीबी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की नाकामी का आईना है जो बच्चों को शिक्षा और सुरक्षा देने का दावा करती है।
जिस उम्र में इस बच्ची के हाथों में किताबें और स्कूल बैग होना चाहिए था, उस उम्र में वह दो बांसों के बीच बंधी पतली रस्सी पर संतुलन बनाकर अपनी जिंदगी दांव पर लगा रही थी। कभी लकड़ी के सहारे, कभी साइकिल की रिंग और कभी थाली के साथ करतब दिखाकर वह लोगों का मनोरंजन करती रही, ताकि शाम को परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटा सके।
तालियां बजती रहीं… जिम्मेदार गुजरते रहे
करीब एक घंटे तक यह नजारा चलता रहा। राहगीर रुकते रहे, तालियां बजाते रहे, वीडियो बनाते रहे। कई जनप्रतिनिधि, अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता भी वहां से गुजरे, लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर यह मासूम स्कूल की बजाय मौत से खेलकर पेट क्यों पाल रही है।
योजनाओं का सच सड़क पर पड़ा है
सरकारी रिपोर्टों में बाल कल्याण योजनाएं सफल बताई जाती हैं, लेकिन अमरपुर की यह तस्वीर उन दावों की सच्चाई उजागर करती है। सवाल यह है कि जब एक बच्ची खुलेआम जोखिम भरे करतब दिखाने को मजबूर है, तब संबंधित विभाग, बाल संरक्षण तंत्र और प्रशासन आखिर कहां है?
अब जवाब चाहिए, सिर्फ भाषण नहीं
यह खबर किसी एक बच्ची की नहीं, बल्कि उन हजारों बच्चों की कहानी है जो गरीबी, लाचारी और सरकारी उदासीनता के बीच अपना बचपन खो रहे हैं। जब तक योजनाएं कागजों से निकलकर जमीन पर नहीं उतरेंगी, तब तक “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे नारे सिर्फ दीवारों और पोस्टरों तक ही सीमित रह जाएंगे।
सवाल सीधा है—क्या जिम्मेदार अधिकारी इस बच्ची तक पहुंचेंगे, या फिर अगली रिपोर्ट में भी सब कुछ “संतोषजनक” बताकर फाइल बंद कर दी जाएगी?
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“जहाँ खबर नहीं, असर दिखता है!”








