
अमरपुर में सरकारी निर्माण की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल! कागजों पर विकास, जमीन पर लापरवाही? साइट इंजीनियर गायब, कर्मचारी नदारद, निर्देशों की अनदेखी; आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है यह निर्माण कार्य?
डिंडौरी/अमरपुर। सरकारी खजाने से 92.17 लाख रुपये खर्च कर ग्रामीणों को बेहतर सड़क देने का दावा किया जा रहा है, लेकिन भपसा पहुंच मार्ग की जमीनी तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। 1.25 किलोमीटर लंबे इस मार्ग के निर्माण में गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पुलिया निर्माण में रेत की जगह डस्ट और गिट्टी मिश्रित सामग्री इस्तेमाल किए जाने के आरोप सामने आए हैं। जनप्रतिनिधियों ने ठेकेदार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए विभागीय जवाबदेही की मांग की है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब निर्माण कार्य की निगरानी के लिए विभागीय अधिकारी मौजूद हैं, तो फिर ठेकेदार को मनमानी करने की छूट कैसे मिल रही है?
SDO के निरीक्षण ने खोली निर्माण की पोल, EE तक पहुंचा मामला
यह केवल ग्रामीणों की शिकायत तक सीमित मामला नहीं है। लोक निर्माण विभाग के अनुविभागीय अधिकारी, उपसंभाग शहपुरा ने 29 अक्टूबर 2026 को निर्माण स्थल का निरीक्षण किया। इसके बाद 30 अक्टूबर 2026 को पत्र क्रमांक 119/SDC/24-21 के माध्यम से कार्यपालन यंत्री (EE), डिंडौरी को निरीक्षण में मिली खामियों से अवगत कराया।
निरीक्षण में जो बातें सामने आईं, वे निर्माण कार्य की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
- KM 1/2 में One Row H.P. का कार्य निर्देशानुसार नहीं पाया गया।
- ठेकेदार द्वारा साइट इंजीनियर नियुक्त नहीं किया गया।
- निर्माण कार्य की गति बेहद धीमी पाई गई।
- निरीक्षण के दौरान साइट पर कोई कर्मचारी मौजूद नहीं मिला।
- बार-बार निर्देश देने के बावजूद लेवल सही नहीं किया गया।
- विभागीय निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है।
SDO ने मामले में मूल्यांकन एवं उचित कार्रवाई की अनुशंसा की है।
शिकायत के बाद रेत पहुंची, तो पहले किस सामग्री से हो रहा था काम?
क्षेत्रीय जनपद सदस्य भागवती मरावी एवं सुनील कुमार मरावी ने आरोप लगाया है कि पुलिया निर्माण में रेत के स्थान पर डस्ट और गिट्टी मिश्रित सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा था। उनका कहना है कि शिकायत के बाद निर्माण स्थल पर रेत पहुंचाई गई।
यदि शिकायत के बाद ही निर्माण सामग्री बदली गई, तो सवाल उठना लाजिमी है कि शुरुआत में किस सामग्री से काम कराया जा रहा था? क्या निर्माण के दौरान गुणवत्ता मानकों की जांच की जा रही थी? और क्या विभागीय अधिकारियों ने समय रहते इसकी निगरानी की?
92.17 लाख की जिम्मेदारी किसकी?
सूचना बोर्ड के अनुसार इस कार्य की लंबाई 1.25 किलोमीटर, अनुबंध राशि 92.17 लाख रुपये और अनुबंध अवधि चार माह है। ठेकेदार का नाम मेसर्स डिवाइन इन्फ्रास्ट्रक्चर, जबलपुर दर्ज है। कार्यपालन यंत्री के रूप में मोहपत सिंह धुर्वे तथा अनुविभागीय अधिकारी के रूप में राजेन्द्र कुमार नामदेव का नाम बोर्ड पर अंकित है।
इतनी बड़ी सरकारी राशि से हो रहे निर्माण में यदि साइट इंजीनियर नहीं है, कर्मचारी मौजूद नहीं हैं और विभागीय निर्देशों का पालन नहीं हो रहा, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
अब सवालों से नहीं चलेगा काम, जवाब देना होगा!
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि पूरे निर्माण कार्य की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जाए। पुलिया में उपयोग की गई सामग्री के नमूनों की प्रयोगशाला में जांच हो, निर्माण की गुणवत्ता का मूल्यांकन कराया जाए और यदि अनियमितता प्रमाणित होती है तो संबंधित ठेकेदार एवं जिम्मेदार अधिकारियों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
सबसे बड़ा सवाल: क्या 92.17 लाख रुपये की सरकारी राशि से गुणवत्तापूर्ण सड़क बनेगी या ग्रामीणों को फिर घटिया निर्माण का खामियाजा भुगतना पड़ेगा? अब निगाहें लोक निर्माण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और जिला प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं।
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