
अमरपुर, डिंडौरी। बच्चों के सुनहरे भविष्य का सपना दिखाकर अभिभावकों से फीस लेने वाले निजी शिक्षण संस्थानों में यदि बच्चों की सुरक्षा ही सवालों के घेरे में आ जाए, तो इससे बड़ा सवाल और क्या हो सकता है? अमरपुर का अमर ज्योति निजी विद्यालय एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। आधी रात करीब 1 बजे छात्रावास से छात्रों के बाहर निकलने और पटाखा दुकान में चोरी के आरोपों ने विद्यालय प्रबंधन की व्यवस्था पर सवालों की बौछार कर दी है।
आधी रात को छात्रावास बना खुला मैदान? आखिर सो रहे थे जिम्मेदार!
सूत्रों के अनुसार, मंगलवार की रात करीब 1 बजे कुछ छात्र छात्रावास से बाहर निकल गए। आरोप है कि छात्र पटाखा दुकान तक पहुंचे और वहां चोरी करते हुए पकड़े गए। बताया जा रहा है कि रात्रि गश्त कर रही पुलिस मौके पर पहुंची और छात्रों को वापस छात्रावास पहुंचाया।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि छात्रावास की सुरक्षा व्यवस्था आखिर किसके भरोसे चल रही थी? मुख्य गेट पर ताला था या सिर्फ औपचारिकता निभाई जा रही थी? वार्डन और कर्मचारी कहां थे? यदि छात्र गेट तोड़कर बाहर गए, तो इसकी जानकारी जिम्मेदारों को समय पर क्यों नहीं हुई?
दुकानदार ने दिखाई दरियादिली, लेकिन विद्यालय की जवाबदेही कौन तय करेगा?
बताया जा रहा है कि दुकानदार ने बच्चों के भविष्य को देखते हुए सख्त कार्रवाई नहीं की। यह उसकी मानवीय सोच हो सकती है, लेकिन क्या इससे विद्यालय प्रबंधन की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
दुकानदार ने बच्चों को माफ कर दिया, लेकिन अभिभावकों के मन में उठे सवालों का जवाब कौन देगा? अगर आधी रात को कोई दुर्घटना हो जाती या बच्चों के साथ कोई अनहोनी हो जाती, तो क्या तब भी केवल समझौते की बात कही जाती?
गेट तोड़कर गए थे छात्र, प्रबंधन ने दी सफाई
संस्थान प्रमुख के अनुसार, छात्र बिना कर्मचारियों को जानकारी दिए अपनी मर्जी से गेट तोड़कर बाहर चले गए थे। बाद में अभिभावकों को बुलाया गया, उनसे लिखित लिया गया, दुकान के नुकसान की भरपाई कराई गई और पुलिस की मौजूदगी में समझौता कराया गया।
लेकिन सवाल यह है कि यदि गेट तोड़कर छात्र बाहर गए, तो छात्रावास की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर कैसे थी? क्या गेट की नियमित जांच होती है? क्या रात में कर्मचारियों की उपस्थिति का कोई रिकॉर्ड है?
लिखित समझौता हो गया, क्या जिम्मेदारी भी खत्म हो गई?
आरोप है कि छात्रों और अभिभावकों से लिखित लेकर नुकसान की भरपाई कराई गई और मामला समझौते के जरिए समाप्त कर दिया गया। लेकिन बच्चों की सुरक्षा कोई ऐसा विषय नहीं है जिसे कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करवाकर खत्म किया जा सके।
समझौता दुकान के नुकसान को लेकर हो सकता है, लेकिन छात्रावास की सुरक्षा और निगरानी की जवाबदेही का सवाल अब भी अपनी जगह खड़ा है।
चौकी प्रभारी को जानकारी नहीं, तो पुलिस कार्रवाई का रिकॉर्ड कहां?
मामले को लेकर चौकी प्रभारी ने जानकारी नहीं होने की बात कही। उन्होंने बताया कि रात्रि गश्त में शामिल पुलिसकर्मी बाहर गए हुए हैं।
अब सवाल यह है कि यदि पुलिस मौके पर पहुंची थी और समझौते की बात कही जा रही है, तो संबंधित चौकी में घटना का रिकॉर्ड और कार्रवाई की जानकारी क्यों स्पष्ट नहीं है? क्या पुलिस विभाग इस पूरे मामले की स्थिति सार्वजनिक करेगा?
पुराने विवादों की चर्चा भी फिर आई सामने
अमर ज्योति विद्यालय का नाम पहले भी विवादों को लेकर चर्चा में रहा है। पूर्व में धर्म परिवर्तन से जुड़े आरोपों और चर्चाओं की बात भी सामने आती रही है। हालांकि, इन पुराने आरोपों की आधिकारिक पुष्टि और जांच की स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। अब छात्रावास की सुरक्षा से जुड़ा ताजा मामला सामने आने के बाद विद्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर फिर सवाल उठने लगे हैं।
प्रशासन कब जागेगा? बच्चों की सुरक्षा से बड़ा आखिर क्या?
अभिभावक अपने बच्चों को भरोसे के साथ विद्यालय और छात्रावास में भेजते हैं। वे फीस केवल पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षित माहौल की उम्मीद में भी देते हैं। ऐसे में यदि आधी रात को छात्र छात्रावास से बाहर पहुंच जाते हैं, तो यह सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और संबंधित पुलिस अधिकारियों से सवाल हैं:
- छात्रावास की सुरक्षा व्यवस्था की जांच कब होगी?
- घटना की रात ड्यूटी पर कौन-कौन कर्मचारी मौजूद थे?
- गेट तोड़ने की घटना की निष्पक्ष जांच होगी या नहीं?
- पुराने विवादों की भी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट की जाएगी या नहीं?
- क्या अभिभावकों को पूरे घटनाक्रम की पारदर्शी जानकारी दी जाएगी?
आखिर सवाल सिर्फ पटाखा दुकान में चोरी के आरोपों का नहीं, बल्कि उन बच्चों की सुरक्षा का है जिनकी जिम्मेदारी संस्थान ने ली है। दुकान के नुकसान की भरपाई हो सकती है, समझौता भी हो सकता है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा से जुड़े सवालों का जवाब समझौते के कागजों में नहीं मिलेगा।
अब देखना यह है कि प्रशासन जांच कर जवाबदेही तय करता है या फिर यह मामला भी आरोप-प्रत्यारोप और समझौते के बीच दबकर रह जाता है।
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