“जब विकास को पुलिस सुरक्षा की जरूरत पड़े, तो समझ लीजिए कहीं न कहीं न्याय मर चुका है…”
“जल-जंगल-जमीन की लड़ाई: मंडला में विकास के नाम पर पुलिस पहरा?”

मंडला। मंडला जिले के बिछिया क्षेत्र से सामने आया एक प्रशासनिक पत्र अब “विकास बनाम अधिकार” की बहस को फिर तेज कर रहा है।
अनुविभागीय दण्डाधिकारी कार्यालय द्वारा जारी पत्र में निर्माण कार्य को सुचारु रूप से चालू कराने के लिए पुलिस बल उपलब्ध कराने की मांग की गई है। मामला बुढ़नेर नदी पर प्रस्तावित पिकअप वियर/स्टॉप डैम निर्माण कार्य से जुड़ा बताया जा रहा है।
पत्र में उल्लेख है कि स्थानीय ग्रामीण निर्माण कार्य का विरोध कर रहे हैं और मशीनों को जलाने तथा कर्मचारियों से मारपीट की आशंका जताई गई है। इसके बाद प्रशासन ने निर्माण स्थल पर पुलिस बल तैनात करने की मांग की।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि परियोजना वास्तव में जनहित और स्थानीय विकास के लिए है, तो फिर स्थानीय लोगों में इतना आक्रोश क्यों है?
क्या ग्रामसभा से स्पष्ट सहमति ली गई?
क्या पESA कानून और पांचवीं अनुसूची के संवैधानिक प्रावधानों का पालन किया गया?
क्या प्रभावित ग्रामीणों की आपत्तियों और आशंकाओं को गंभीरता से सुना गया?
आदिवासी क्षेत्रों में जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं होते, बल्कि लोगों की आजीविका, संस्कृति और अस्तित्व से जुड़े होते हैं। ऐसे में बिना भरोसे और संवाद के किसी भी परियोजना को लागू करना अक्सर टकराव की स्थिति पैदा करता है।
चिंता की बात यह भी है कि जिन ग्रामीणों को अपनी ही भूमि और नदी के सवाल पर आवाज उठानी पड़ रही है, उन्हें “बाहरी तत्व” या “कानून व्यवस्था की चुनौती” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
इससे प्रशासन की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में विकास का रास्ता संवाद और सहमति से निकलता है, न कि पुलिस बल और दबाव से।
अगर स्थानीय समुदाय को विश्वास में लिया जाता, तो शायद हालात यहां तक नहीं पहुंचते।
यह मामला अब केवल एक निर्माण कार्य का नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकार, संवैधानिक व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुका है।
इतिहास गवाह है—
जहाँ संवाद कमजोर पड़ता है, वहाँ संघर्ष जन्म लेता है।
प्रमुख सवाल
- क्या ग्रामसभा की सहमति ली गई थी?
- क्या पESA कानून का पालन हुआ?
- विकास के नाम पर स्थानीय लोगों की आवाज क्यों दबाई जा रही है?
- क्या पुलिस बल समाधान है या संवाद?