
डिंडोरी में जनसेवा नहीं, प्रचार का पाप चल रहा है?
डिंडोरी। तपती धूप… 45 डिग्री की आग उगलती गर्मी… सड़क किनारे बैठे मजदूर… बूढ़ी आंखों में पानी की उम्मीद… और दूसरी तरफ नगर परिषद के विशाल फ्लेक्सों पर चमकते चेहरे।
डिंडोरी में इस वक्त अगर कुछ सबसे ज्यादा बह रहा है, तो वह पानी नहीं… बल्कि जनता के सब्र का बांध है।
नगर परिषद और उसकी अध्यक्ष ने “सार्वजनिक प्याऊ” को जनसेवा नहीं, बल्कि राजनीतिक विज्ञापन का अड्डा बना दिया है। शहर में जहां-जहां पानी होना चाहिए था, वहां नेताओं के फोटो लहरा रहे हैं। जहां मटके रखे जाने थे, वहां बड़े-बड़े फ्लेक्स खड़े कर दिए गए। ऐसा लग रहा है मानो जनता की प्यास बुझाने नहीं, बल्कि चेहरों की ब्रांडिंग करने का अभियान चलाया गया हो।
सबसे शर्मनाक तस्वीर तब सामने आई जब राहगीर तपती सड़क पर पानी की तलाश में भटकते नजर आए, लेकिन प्याऊ केंद्रों पर सिर्फ पोस्टर मिले। कहीं सूखे मटके, कहीं खाली स्टैंड, तो कहीं केवल बैनर। सवाल यह है कि आखिर नगर परिषद जनता को पानी देना चाहती थी या फोटो खिंचवाना?
स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि नगर परिषद अध्यक्ष और जिम्मेदार अधिकारी जनता की तकलीफों से पूरी तरह कट चुके हैं। गरीब मजदूर, आटो चालक, महिलाएं और बुजुर्ग चिलचिलाती धूप में एक बूंद पानी के लिए तरसते रहे, लेकिन परिषद के दफ्तरों में शायद एसी की ठंडक ने इंसानियत को भी जमा दिया।

शहर के नागरिक पूछ रहे हैं —
अगर प्याऊ में पानी नहीं था, तो लाखों के फ्लेक्स किसलिए लगाए गए?
क्या जनता की प्यास से ज्यादा जरूरी नेताओं की फोटो थी?
क्या नगर परिषद अब सेवा नहीं, सिर्फ प्रचार परिषद बनकर रह गई है?
लोगों का आरोप है कि पूरी योजना में पानी से ज्यादा पैसा पोस्टरों और प्रचार सामग्री पर बहाया गया। हर चौराहे पर नेताओं के चेहरे दिखाई दिए, लेकिन जनता को पानी नहीं मिला।
यह सिर्फ लापरवाही नहीं… बल्कि संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
जिस गर्मी में इंसान का गला सूख जाए, उस गर्मी में “सार्वजनिक प्याऊ” के नाम पर जनता को छलना किसी अपराध से कम नहीं।
नगर परिषद की यह व्यवस्था अब सवालों के घेरे में ही नहीं, बल्कि जनता के गुस्से के कटघरे में खड़ी है।
“डिंडोरी की सड़कों पर जनता प्यास से तड़पती रही…
और नगर परिषद पोस्टरों में अपनी वाहवाही पीती रही…” 🔥
“मटकों में पानी नहीं था…
लेकिन नेताओं की तस्वीरों में घमंड छलक रहा था…” 💥