आदिवासी क्षेत्रों में बड़ा झटका!

भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने आदिवासी बाहुल्य जिलों में कार्यरत पेसा मोबिलाइज़र्स की सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया है। पंचायत राज संचालनालय के इस फैसले के बाद हजारों युवाओं के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर जिन युवाओं से वर्षों तक गांव-गांव योजनाओं का प्रचार कराया गया, आज उन्हीं को अचानक बाहर का रास्ता क्यों दिखाया जा रहा है?
प्रदेश के मंडला, डिंडौरी, बालाघाट, अलीराजपुर, झाबुआ, बड़वानी, धार, उमरिया और शहडोल जैसे आदिवासी जिलों में पेसा मोबिलाइज़र्स ग्राम सभाओं और पंचायतों के बीच सरकार की योजनाओं का काम संभाल रहे थे। लेकिन अब एक आदेश के जरिए उनकी सेवाएं समाप्त करने की तैयारी ने राजनीतिक माहौल गर्मा दिया है।
विपक्षी नेताओं और सामाजिक संगठनों ने सरकार पर आदिवासी युवाओं के साथ “विश्वासघात” करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि चुनाव के समय रोजगार और सशक्तिकरण की बातें करने वाली सरकार अब युवाओं को सड़क पर लाने का काम कर रही है।
ग्रामीण इलाकों में भी इस फैसले को लेकर नाराज़गी बढ़ती दिखाई दे रही है। लोगों का कहना है कि पेसा कानून और ग्राम सभाओं को मजबूत करने की बात सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है। यदि मोबिलाइज़र्स हटाए गए तो गांवों में योजनाओं की निगरानी और जागरूकता का काम प्रभावित होगा।
अब बड़ा सवाल यही है —
👉 क्या सरकार इन युवाओं के भविष्य की जिम्मेदारी लेगी?
👉 क्या आदिवासी क्षेत्रों में रोजगार खत्म करना ही विकास मॉडल है?
👉 और क्या चुनाव खत्म होते ही वादे भी खत्म हो गए?
फिलहाल सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है, लेकिन आदेश के बाद आदिवासी अंचलों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
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