ब्लॉक में पोस्टिंग… लेकिन जिंदगी जिला मुख्यालय में!

सरकार जनता से कह रही — “तेल बचाओ”… और अफसर कर रहे सरकारी डीजल का खुला खेल?
डिंडौरी। डिंडौरी जिले में सरकारी सिस्टम को लेकर अब जनता खुलकर सवाल पूछने लगी है।
एक तरफ सरकार देश को ईंधन बचाने, खर्च कम करने और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग का पाठ पढ़ा रही है…
दूसरी तरफ जिले के कई अधिकारी सरकारी गाड़ियों को मानो निजी सुविधा केंद्र बनाकर रोजाना डीजल की “सरकारी होली” खेल रहे हैं।
कलेक्टर ने जारी किए सख्त निर्देश ⛽📑
डिंडौरी कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी द्वारा पेट्रोल-डीजल बचत को लेकर महत्वपूर्ण आदेश जारी किए गए हैं।
भारत सरकार एवं प्रधानमंत्री के ऊर्जा संरक्षण अभियान के तहत सभी विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों को ईंधन बचत सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
आदेश में साफ कहा गया है कि—
✔️ सरकारी वाहनों का उपयोग केवल शासकीय कार्यों के लिए होगा
✔️ अनावश्यक वाहन उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा
✔️ Vehicle Pooling को बढ़ावा दिया जाएगा
✔️ छोटी दूरी के लिए पैदल या साइकिल उपयोग की सलाह
✔️ बैठकों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से आयोजित करने पर जोर
✔️ ईंधन खपत की नियमित निगरानी और जवाबदेही तय करने के निर्देश
लेकिन सवाल यह है कि क्या ये आदेश जमीन पर दिखाई दे रहे हैं?
सुबह सरकारी कुर्सी… शाम जिला वापसी! 🚗💨
सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार जिले के कई विभागों में पदस्थ अधिकारी-कर्मचारी ब्लॉक मुख्यालय में रुकना ही नहीं चाहते।
तहसीलदार, डॉक्टर, जनपद CEO, जनपद SDO, PHE, वन विभाग, परियोजना अधिकारी समेत कई विभागों के अधिकारियों पर रोजाना सरकारी वाहनों से अप-डाउन करने के आरोप लग रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है—
«“ब्लॉक में सिर्फ हाजिरी लगती है… असली ठिकाना जिला मुख्यालय है।”»
सुबह सरकारी गाड़ी में ब्लॉक पहुंचना…
शाम होते ही फिर जिला मुख्यालय की ओर काफिला निकल पड़ना…
अब यह व्यवस्था नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर “स्थायी संस्कृति” बनती दिखाई दे रही है।
सरकारी गाड़ी या VIP टैक्सी सर्विस? ⚠️
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर—
❓ सरकारी गाड़ियां जनता के काम के लिए हैं या अधिकारियों की निजी सुविधा के लिए?
❓ क्या सरकारी डीजल को निजी आराम में झोंकने की खुली छूट है?
❓ क्या ब्लॉक मुख्यालय अब सिर्फ “औपचारिक पोस्टिंग सेंटर” बनकर रह गए हैं?
❓ और अगर रोज अप-डाउन ही करना है, तो मुख्यालय पर पदस्थापना का मतलब क्या है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई अधिकारियों की निजी गाड़ियां घरों में खड़ी रहती हैं, जबकि सरकारी वाहन रोज सैकड़ों किलोमीटर दौड़ते हैं।
सरकार कह रही — “ईंधन बचाओ”… सिस्टम कह रहा — “डीजल जलाओ!” ⛽🔥
देश में प्रधानमंत्री ऊर्जा संरक्षण की अपील कर रहे हैं।
मोहन सरकार खर्च कम करने और संसाधनों के सीमित उपयोग की बात कर रही है।
लेकिन डिंडौरी में तस्वीर उल्टी दिखाई दे रही है।
जनता पूछ रही है—
«“जब नियम बनाने वाले ही नियम तोड़ेंगे, तो आम आदमी से पालन की उम्मीद कैसी?”»
कार्यालयों में जनता इंतजार करती है… और गाड़ियां सड़क नापती हैं! 🏢⏰
ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोगों का आरोप है कि कई बार अधिकारी समय पर कार्यालय नहीं पहुंचते।
शाम होते ही मुख्यालय छोड़ दिया जाता है।
जिसका सीधा असर आम जनता की समस्याओं और सरकारी कामकाज पर पड़ता है।
लोग सवाल उठा रहे हैं—
«“अगर अधिकारी ब्लॉक मुख्यालय में रुकेंगे ही नहीं, तो ग्रामीण जनता की समस्याएं सुनी कब जाएंगी?”»
अब बड़ा सवाल — जिम्मेदार कौन? 👀
क्या जिले में सरकारी गाड़ियों की GPS मॉनिटरिंग होती है?
क्या रोजाना होने वाले अप-डाउन का रिकॉर्ड रखा जाता है?
क्या शासन ने अधिकारियों को सरकारी खर्च पर “डेली ट्रैवल सुविधा” दी है?
या फिर सरकारी खजाना बिना हिसाब के जलाया जा रहा है?
डिंडौरी में अब यह सिर्फ चर्चा नहीं रही…
बल्कि सरकारी जवाबदेही, ईंधन बचत और प्रशासनिक अनुशासन पर बड़ा सवाल बन चुका है।
🔥 अब देखना होगा — प्रशासन कार्रवाई करता है… या फिर सरकारी डीजल पर चलता यह “अप-डाउन मॉडल” यूं ही जारी रहेगा।
Socialnetworkingservices.in