डिंडौरी। जिले के कई सरकारी दफ्तरों में इन दिनों ऐसा नजारा देखने को मिल रहा है कि जनता भी हैरान है और कर्मचारी भी परेशान।
जहां कभी खाकी ड्रेस में फाइल उठाने वाले कर्मचारी नजर आते थे…
आज वही कुर्सी पर बैठकर कम्प्यूटर चला रहे हैं, आदेश दे रहे हैं और खुद को ऑफिस का “मिनी अधिकारी” समझने लगे हैं!
दफ्तरों में अब हालत ये है कि —
👉 ड्रेस गायब
👉 नियम गायब
👉 जिम्मेदारी गायब
👉 लेकिन रौब पूरा ऑन!
सूत्र बताते हैं कि कुछ कार्यालयों में चपरासी और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी सीधे बाबूगिरी मोड में आ चुके हैं।
किसी के हाथ में सरकारी फाइल, किसी के सामने कम्प्यूटर, तो कोई सीधे जनता से आवेदन लेकर “साहब अभी मीटिंग में हैं” वाला डायलॉग मार रहा है!
जनता का तंज भी कम नहीं…
“पहले चपरासी साहब के बुलावे पर आता था…
अब साहब खुद चपरासी के बुलावे पर पहुंच रहे हैं!”“सरकारी नौकरी नहीं… लगता है रोल एक्सचेंज योजना चल रही है!”
असली बाबू भी परेशान…
दफ्तरों में काम करने वाले नियमित क्लर्क और कम्प्यूटर ऑपरेटर तक कन्फ्यूज हैं कि आखिर कर्मचारी कौन है और अधिकारी कौन!
कई जगह तो स्थिति ऐसी बताई जा रही है कि “जिसकी राजनीतिक पकड़ मजबूत… वही ऑफिस का असली खिलाड़ी!”
चर्चा ये भी है कि कुछ कर्मचारियों को नेताओं और बड़े अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है, इसलिए नियम-कायदे ताक पर रख दिए गए हैं।
यूनिफॉर्म पहनना अब “पुरानी सोच” माना जा रहा है और बाबूगिरी दिखाना नया फैशन बन चुका है!
सबसे बड़ा सवाल प्रशासन से…
क्या सरकारी दफ्तरों में अब पद और जिम्मेदारियों की कोई सीमा नहीं बची?
क्या यूनिफॉर्म और ड्रेस कोड सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
क्या बिना अधिकार कर्मचारी सरकारी कार्य और कम्प्यूटर संचालन कर सकते हैं?
क्या अधिकारियों की मौन सहमति से पूरा खेल चल रहा है?
या फिर राजनीतिक दबाव के आगे सिस्टम पूरी तरह नतमस्तक हो चुका है?
जनता पूछ रही है…
अगर सब कुछ नियमों के अनुसार है तो यूनिफॉर्म गायब क्यों है?
और अगर नियम टूट रहे हैं तो कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई?
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं…
क्या कलेक्टर मैडम इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करवाएंगी?
या फिर सरकारी दफ्तरों में ऐसे ही चलता रहेगा —
“चपरासी से बाबू बनने का सुपरहिट राजनीतिक शो!”